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Showing posts from 2019

Oh please someone lend me a hand...

Oh Hi, Can you please lend me a hand? I am drowning in this crowded land!! I may look quiet outside, But am freaking out inside. I don 't know what's so wrong, what's hurting my soul on and on. Oh Hi, Can you please lend me a hand? I have these feelings I don't understand!! I am free, I feel trapped. It has been long I have slept. I don't know why my heart is full of guilt, for the things I never built. Oh Hi, Can you please lend me a hand? Do something with your magic wand? Relieve me of all the pain I carry, l ighten my head by taking away my worries. Oh please someone lend me a hand ...

Still Waiting

It has been a long time since I have been waiting. Waiting for the undiscovered truth to be discovered From where we come, where we go, I still wonder. Why struggle so hard for such a mortal life? And if it has to end, why is it wrong to end it now? Why can’t we decide our own end? Begining is never in our hands. How we find similarity with other beings? And if we are so similar why we die for those who are so different? Why every wrong feels so tempting? Why doing right is always so intimidating? Why are we afraid to stand up for our own goodwill? Why are we against those who do this? Sometimes I feel my life does not belong to me I don’t have the rights to decide where it leads. It’s the world that decides everything for me. I am just a puppet, struggling to break free. Can I just run away, just for once to understand what does it mean to live? I don’t understand, I don’t wanna come back, but I still fear what if I can’t. Borrowing two lines from Davies’ Leisure,...

होम-कमिंग

आँखों में कुछ बड़ी उम्मीदें लिए चल दिए उस अनजान शहर की ओर न रहने का ठिकाना था न खाने का कुछ पता था पर थी सपनों में इतनी ताकत की बना लिया छोटा आशियाना वहाँ नहीं थी खबर मुझे की  दूर की चकाचौंध भी सिर्फ अँधेरों में भाती है लौट कर आना तो घर ही है खुशियाँ वहीं से आती है

आसमाँ की पूर्णता

मॉल की लॉन में बैठे हुए  देख रही थी मैं नीले अम्बर को झाँक रहे थे बादल ऊँची बिल्डिंग्स के बीच से  कितनी शान्ति थी वहाँ एक अलग-सा सुकून महसूस हो रहा था उनकी दीदार से  मैंने एक नज़र अपने बगल में भी डाली  रोड पे खड़ी ट्रैफ़िक समझ आया कितना बेसब्र है आदमी कितनी हड़बड़ी है उसे  न जाने किस दौड़ का हिस्सा बना हुआ है वो जो ठहर कर एक पल के लिए एक लम्बी गहरी साँस भी नहीं ले सकता कितना सुन्दर एहसास था  उनका हाथ पकड़कर आसमाँ की पूर्णता को समझना ।

एहसास

ना जाने ऐसा क्यों होता है, जो आपका होता है वही पराया हो जाता है| सोचा था साथ रहेंगे हमेशा, किसे पता था नफरत करेंगे इस तरह|| कल जो मिले थे हँस के, आज वो ही पल आँखों में आँसू ला देते हैं| अनजाने में मिली वो जो ख़ुशी थी, अनजाने में दुःख दे जाते हैं|| लगता था जी ना पाएँगे हम जिसके बिना, आज उसके साथ ना जीने की कसम खा ली है| हँसी की वजह बनाया था हमने जिसे, उसके बग़ैर मुस्कराने की आदत दाल ली है|| टहलते हुए पहुँच जाते हैं, उन हसीन जगहों पे कभी| मुस्कान तो आती ही है, ग़म भी लौट आते हैं सभी|| अपनों के लिए जीना चाहते थे, अपने ही कहीं खो गए| अब खुद के लिए भी जीना है, अपनों को खोज कर|| आँखें पढ़ लेते थे जो, हम कैसे नहीं पढ़ पाए उनकी आँखें| प्यार किया था जिनसे, हम कैसे नहीं समझ पाए उनकी बातें|| दौड़ में हमेशा अव्वल आते थे वो, भागना उन्हें पसंद था| जिंदगी से भाग रहे थे वो, हमे कहाँ पता था|| सीखा था जिनसे भरोसा करना, उन्होंने ही भरोसा तोड़ दिया| हर छोटी बात पर रो पड़ते थे हम, उन्होंने दर्द में भी मुस्कराने के लिए छोड़ दिया||

कॉलेज के आखिरी कुछ दिन (Farewell)

बस अब आखिरी के कुछ दिन ही तो रह गए हैं, मानो हम मेहमान बन गए हैं । समेट रही हूँ जो कुछ भी समेट सकूँ, पर सब बिखरा-बिखरा सा लग रहा है, मानो मेरा ही कोई एक हिस्सा पीछे छूट रहा है । ये चार साल का सफर आठ सेकंड में रिवाइंड हो जाता है, कुछ 16 एक्सप्रेशंस और अनगिनत इमोशंस दे जाता है । न जाने इस सफर की कैसी शुरुआत हुई होगी, करीब-करीब 100 लोगों से मुलाकात हुई होगी, 50 से बात हुई होगी और 5 दिल में बस गए होंगे बस फिर क्या, हम उनके साथ चल दिए होंगे । मुझे तो यह भी नहीं पता इस सफर का अंत किसे मानूँ? उस पल को जो मुझे लगता है मेरा डिपार्टमेंट में आखिरी पल हो सकता है उसे जब मुझे लगता है मैं अपना कपबोर्ड आखिरी बार बंद कर रही होंगी, या फिर उसे जो मुझे लगता है दोस्तों से आखिरी मुलाकात हो सकती है। क्या एक और मुलाकात की उम्मीद करना गलत होगा? मन तो नहीं है पर आगे तो बढ़ना ही है, पर कुछ पल ठहर कर आँखें नम करने में भी कुछ बुराई नहीं है ।

Thoughts (विचार)

1. Everything need not have a reason and a lesson. 2. तकदीर तो बदल नहीं सकते, आदत ही बदल लीजिये ज़नाब । 3. If you feel a misfit in your life, congratulations, you are alive !! 4. No matter what, you can't change the clocks!! 5. When He's there to maintain account of our actions, who are we to judge!! 6. Go a little off-track to get on track!! 7. Just one sentence and you can loose yourself into someone else's dream. 8. One doesn't need a reason but enough courage to be happy. 9. Life is a strange sequence of familiar events 10. When you become aware of someone's presence not by any physical senses but the warmth you can feel. Yes it's love. 11. It feels great when someone stumbles before you not due to lack of confidence but due to love the person holds in the heart. It feels great when you can feel the warmth of the person standing at a distance of a hand or two away from you. It feels great when someone wants to witness every action you perform. Yes it...

वादा

बैठ कर बगीचे की एक सीट पर, देख रही हूँ मैं नीले अम्बर को। चहक रहीं हैं चिड़ियाँ कितनी, महक रहें हैं फूल कितने। इतरा रहीं हैं तितलियाँ, छीप रहीं हैं गिलहरियां। खेल रहें हैं बच्चें भी, हँस रहें हैं बड़े भी। फिर क्यों है मुझमें निराशा इतनी, जब चारों तरफ है अभिलाषा इतनी। क्यों मैं खो जाती हूँ रात के अँधेरों में, जब आशा है सुबह के उजियारों में। क्यों करती हूँ मैं उनकी शिकवा जो छोड़ कर चले गए, क्यों नहीं मुझे उनकी परवाह जो साथ खड़े रह गए। चलो आज करती हूँ खुद से एक वादा, रहेगा रोज़ मुस्कुराने का इरादा। चाहे कितने भी मुश्किल हों रास्ते, पूरा करुँगी खुद से किए हर वादे।

बचपन

सपनों में यूँ ही चले आते हो, एक मीठा-सा एहसास दे जाते हो पलकें भी नहीं तैयार बिछड़ने को इतनी ख़ूबसूरत महफ़िल जमा जाते हो। कभी देखा था तुम्हे दूर से हर पल मुस्कुराते रहते थे तुम प्यारी-सी हँसी थी, आँखों में बेहद ख़ुशी थी दुनिया के सच से अनजान थे तुम। मैं आज भी तुम्हारा इंतज़ार करती हूँ पलटकर फिर एक बार देखती हूँ ऐ बचपन तुम लौटकर फिर क्यों नहीं आते हो?

अन्याय

कुछ दिनों पहले की बात है । मैंने उसे सड़क के किनारे पत्थर बीनते हुए देखा था । मासूम चेहरा, गहरी आँखें, और हमेशा बोलते रहने को तत्पर होंठ । बड़े मन से वो अलग अलग तरह के पत्थर बिन रही थी । वहीं पर एक महिला अपने झोले को लापरवाही से छोड़कर फ़ोन पर बातें कर रही थी । वह लड़की पत्थर बीनते बीनते वहाँ पर पहुंची | झोले के निचे पड़े खूबसूरत से पत्थर को उठाने झुकी ही थी कि महिला ने शोर मचा दिया कि वह चोरी कर रही है । उसकी छान-बिन हुई और कुछ न मिलने पर लोगो ने उसे घिन्न नज़रों से देखकर छोड़ दिया । मैंने देखा था उसने झोले को छुआ तक नहीं था । और लोगों ने भी देखा ही होगा । पर किसी ने भी उसका साथ नहीं दिया शायद इसीलिए क्योंकि न चाहते हुए भी हम सब और मैं भी इस अन्याय कि दुनिया का हिस्सा हैं ।

Destination lies in future

So here comes the future knocking at my door, while my past still stands behind me. The future looks mysterious and mischevious, the past looks beautiful and calm. I am willing to move on with the future, while the past holds on my hands. Here, I stand still unable to make a move. I pack many good memories, while the bad ones get stuck somewhere in my head. I take a look back at the past and then I move on with the present towards the future because that's where the destination lies.

Let your heart beat!!

Deep in your heart, where love is to be found wrapped cozily by relaxation and protected by energy. Let's expose it to the rules of nature, allow it to make mistakes and learn Let's make it strong enough to protect everyone's heart around.

क्योंकि यही ज़िन्दगी है!

मुझे आज भी वो दिन याद आते हैं, जब हम टॉफ़ी के लिए जी-जान लगा देते थे|| मुझे आज भी वो दिन याद आते हैं, जब हम काँच की शीशी टूट जाने पर उसे बिस्तर के नीचे सरका देते थे|| मुझे आज भी वो दिन याद आते हैं, जब कम नम्बर आने पर माँ-पापा के सामने आँसू पहले आंसर शीट बाद में पेश किये जाते थे|| मुझे आज भी वो दिन याद आते हैं, जब हम घंटों बैठ कर फ़िज़िक्स के उस एक प्रश्न में अटके रहते थे|| मुझे आज भी वो दिन याद आते हैं, और जब याद आते हैं, ज़ुबान पर बस पाँच शब्द आते हैं-वो भी क्या दिन थे|| परन्तु आज भी कुछ ख़ास बदला नहीं है|| तब भी हम ग़ल्तियाँ करते थे, आज भी करते हैं| फ़र्क सिर्फ़ इतना है, तब हम सुधार लेते थे आज मौका नहीं मिलता|| तब टॉफ़ी के लिए मेहनत करते थे, आज रोटी के लिए करते हैं| फ़र्क सिर्फ़ इतना है, तब लगन होती थी आज ज़रूरत है|| तब भी कम नम्बर आते थे, आज भी कम ही आते हैं| फ़र्क सिर्फ़ इतना है, तब हम टूट कर और मज़बूती से जुड़ जाते थे आज टूट कर बिखर जाते हैं|| तब भी हम घंटों बैठ कर प्रश्न में उलझे रहते थे, आज भी ऑफ़िस में बैठ कर बग्स के साथ उलझे रहते हैं| फ़र्क सिर्फ़ इतना है, तब जिज्ञासा थी, आज मज़बूरी है|| तब...