वादा

बैठ कर बगीचे की एक सीट पर,
देख रही हूँ मैं नीले अम्बर को।

चहक रहीं हैं चिड़ियाँ कितनी,
महक रहें हैं फूल कितने।

इतरा रहीं हैं तितलियाँ,
छीप रहीं हैं गिलहरियां।

खेल रहें हैं बच्चें भी,
हँस रहें हैं बड़े भी।

फिर क्यों है मुझमें निराशा इतनी,
जब चारों तरफ है अभिलाषा इतनी।

क्यों मैं खो जाती हूँ रात के अँधेरों में,
जब आशा है सुबह के उजियारों में।

क्यों करती हूँ मैं उनकी शिकवा जो छोड़ कर चले गए,
क्यों नहीं मुझे उनकी परवाह जो साथ खड़े रह गए।

चलो आज करती हूँ खुद से एक वादा,
रहेगा रोज़ मुस्कुराने का इरादा।

चाहे कितने भी मुश्किल हों रास्ते,
पूरा करुँगी खुद से किए हर वादे।

Comments

  1. वाह सोनी जी वाह! वाह सोनी जी।

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  2. nice lines .....are you new to blogger?

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    Replies
    1. Thankyou so much!!
      Yes, I am new to Blogger and am looking much forward to it.

      Delete

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