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Showing posts from April, 2019

वादा

बैठ कर बगीचे की एक सीट पर, देख रही हूँ मैं नीले अम्बर को। चहक रहीं हैं चिड़ियाँ कितनी, महक रहें हैं फूल कितने। इतरा रहीं हैं तितलियाँ, छीप रहीं हैं गिलहरियां। खेल रहें हैं बच्चें भी, हँस रहें हैं बड़े भी। फिर क्यों है मुझमें निराशा इतनी, जब चारों तरफ है अभिलाषा इतनी। क्यों मैं खो जाती हूँ रात के अँधेरों में, जब आशा है सुबह के उजियारों में। क्यों करती हूँ मैं उनकी शिकवा जो छोड़ कर चले गए, क्यों नहीं मुझे उनकी परवाह जो साथ खड़े रह गए। चलो आज करती हूँ खुद से एक वादा, रहेगा रोज़ मुस्कुराने का इरादा। चाहे कितने भी मुश्किल हों रास्ते, पूरा करुँगी खुद से किए हर वादे।

बचपन

सपनों में यूँ ही चले आते हो, एक मीठा-सा एहसास दे जाते हो पलकें भी नहीं तैयार बिछड़ने को इतनी ख़ूबसूरत महफ़िल जमा जाते हो। कभी देखा था तुम्हे दूर से हर पल मुस्कुराते रहते थे तुम प्यारी-सी हँसी थी, आँखों में बेहद ख़ुशी थी दुनिया के सच से अनजान थे तुम। मैं आज भी तुम्हारा इंतज़ार करती हूँ पलटकर फिर एक बार देखती हूँ ऐ बचपन तुम लौटकर फिर क्यों नहीं आते हो?