प्रकृति की काया

 बहुत दिनों बाद कुछ लिखने की कोशिश कर रही हूँ,

खुद को शब्दों में पिरोने की कोशिश कर रही हूँ। 

कोई शब्द नहीं मिल रहे क्यूंकि,

पहली बार देखा है प्रकृति को इतने करीब से,

शायद कम लोगों को मिलता है ये मौका नसीब से। 

गिलहरियों का खेल, मिट्ठू के पंख, और काग की उड़ान,

इन सब के बीच लहराते हुए तिरंगे की शान। 

क्यों न हो हमें हिंदुस्तान पर नाज़,

जब इतनी बेमिसाल है इसकी पहचान। 

अरे देखो तो इन मेहनती चींटियों को कैसे भागी जा रही हैं,

न जाने किस मंज़िल की और तशरीफ़ रखी जा रही हैं। 

आओ कुछ पल तुम भी बैठो हमारे साथ,

शायद प्रकृति की काया में तुम्हें भी मिल जाये अपने जीवन का सार। 

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