क्योंकि यही ज़िन्दगी है!
मुझे आज भी वो दिन याद आते हैं,
जब हम टॉफ़ी के लिए जी-जान लगा देते थे||
मुझे आज भी वो दिन याद आते हैं,
जब हम काँच की शीशी टूट जाने पर उसे बिस्तर के नीचे सरका देते थे||
मुझे आज भी वो दिन याद आते हैं,
जब कम नम्बर आने पर माँ-पापा के सामने आँसू पहले आंसर शीट बाद में पेश किये जाते थे||
मुझे आज भी वो दिन याद आते हैं,
जब हम घंटों बैठ कर फ़िज़िक्स के उस एक प्रश्न में अटके रहते थे||
मुझे आज भी वो दिन याद आते हैं,
और जब याद आते हैं, ज़ुबान पर बस पाँच शब्द आते हैं-वो भी क्या दिन थे||
परन्तु आज भी कुछ ख़ास बदला नहीं है||
तब भी हम ग़ल्तियाँ करते थे, आज भी करते हैं|
फ़र्क सिर्फ़ इतना है, तब हम सुधार लेते थे आज मौका नहीं मिलता||
तब टॉफ़ी के लिए मेहनत करते थे, आज रोटी के लिए करते हैं|
फ़र्क सिर्फ़ इतना है, तब लगन होती थी आज ज़रूरत है||
तब भी कम नम्बर आते थे, आज भी कम ही आते हैं|
फ़र्क सिर्फ़ इतना है, तब हम टूट कर और मज़बूती से जुड़ जाते थे आज टूट कर बिखर जाते हैं||
तब भी हम घंटों बैठ कर प्रश्न में उलझे रहते थे, आज भी ऑफ़िस में बैठ कर बग्स के साथ उलझे रहते हैं|
फ़र्क सिर्फ़ इतना है, तब जिज्ञासा थी, आज मज़बूरी है||
तब भी हमें ज़िन्दगी से शिकायतें थीं, आज भी हैं|
फ़र्क सिर्फ़ इतना है, वो कल था इसलिए सुहाना लगता है|
ये आज है इसलिए बेगाना लगता है||
मुझे आज भी वो दिन याद आते हैं,
और ये बात भी समझ आती है,
ख़ुशी है तो ज़िन्दगी है,
दुःख है तो ज़िन्दगी है,
आज जैसा भी हो कल सुहाना लगेगा ही,
क्योंकि यही ज़िन्दगी है||
जब हम टॉफ़ी के लिए जी-जान लगा देते थे||
मुझे आज भी वो दिन याद आते हैं,
जब हम काँच की शीशी टूट जाने पर उसे बिस्तर के नीचे सरका देते थे||
मुझे आज भी वो दिन याद आते हैं,
जब कम नम्बर आने पर माँ-पापा के सामने आँसू पहले आंसर शीट बाद में पेश किये जाते थे||
मुझे आज भी वो दिन याद आते हैं,
जब हम घंटों बैठ कर फ़िज़िक्स के उस एक प्रश्न में अटके रहते थे||
मुझे आज भी वो दिन याद आते हैं,
और जब याद आते हैं, ज़ुबान पर बस पाँच शब्द आते हैं-वो भी क्या दिन थे||
परन्तु आज भी कुछ ख़ास बदला नहीं है||
तब भी हम ग़ल्तियाँ करते थे, आज भी करते हैं|
फ़र्क सिर्फ़ इतना है, तब हम सुधार लेते थे आज मौका नहीं मिलता||
तब टॉफ़ी के लिए मेहनत करते थे, आज रोटी के लिए करते हैं|
फ़र्क सिर्फ़ इतना है, तब लगन होती थी आज ज़रूरत है||
तब भी कम नम्बर आते थे, आज भी कम ही आते हैं|
फ़र्क सिर्फ़ इतना है, तब हम टूट कर और मज़बूती से जुड़ जाते थे आज टूट कर बिखर जाते हैं||
तब भी हम घंटों बैठ कर प्रश्न में उलझे रहते थे, आज भी ऑफ़िस में बैठ कर बग्स के साथ उलझे रहते हैं|
फ़र्क सिर्फ़ इतना है, तब जिज्ञासा थी, आज मज़बूरी है||
तब भी हमें ज़िन्दगी से शिकायतें थीं, आज भी हैं|
फ़र्क सिर्फ़ इतना है, वो कल था इसलिए सुहाना लगता है|
ये आज है इसलिए बेगाना लगता है||
मुझे आज भी वो दिन याद आते हैं,
और ये बात भी समझ आती है,
ख़ुशी है तो ज़िन्दगी है,
दुःख है तो ज़िन्दगी है,
आज जैसा भी हो कल सुहाना लगेगा ही,
क्योंकि यही ज़िन्दगी है||
गजब dost
ReplyDeleteबहुत subder blog h apka
ReplyDelete