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Showing posts from March, 2019

अन्याय

कुछ दिनों पहले की बात है । मैंने उसे सड़क के किनारे पत्थर बीनते हुए देखा था । मासूम चेहरा, गहरी आँखें, और हमेशा बोलते रहने को तत्पर होंठ । बड़े मन से वो अलग अलग तरह के पत्थर बिन रही थी । वहीं पर एक महिला अपने झोले को लापरवाही से छोड़कर फ़ोन पर बातें कर रही थी । वह लड़की पत्थर बीनते बीनते वहाँ पर पहुंची | झोले के निचे पड़े खूबसूरत से पत्थर को उठाने झुकी ही थी कि महिला ने शोर मचा दिया कि वह चोरी कर रही है । उसकी छान-बिन हुई और कुछ न मिलने पर लोगो ने उसे घिन्न नज़रों से देखकर छोड़ दिया । मैंने देखा था उसने झोले को छुआ तक नहीं था । और लोगों ने भी देखा ही होगा । पर किसी ने भी उसका साथ नहीं दिया शायद इसीलिए क्योंकि न चाहते हुए भी हम सब और मैं भी इस अन्याय कि दुनिया का हिस्सा हैं ।

Destination lies in future

So here comes the future knocking at my door, while my past still stands behind me. The future looks mysterious and mischevious, the past looks beautiful and calm. I am willing to move on with the future, while the past holds on my hands. Here, I stand still unable to make a move. I pack many good memories, while the bad ones get stuck somewhere in my head. I take a look back at the past and then I move on with the present towards the future because that's where the destination lies.

Let your heart beat!!

Deep in your heart, where love is to be found wrapped cozily by relaxation and protected by energy. Let's expose it to the rules of nature, allow it to make mistakes and learn Let's make it strong enough to protect everyone's heart around.

क्योंकि यही ज़िन्दगी है!

मुझे आज भी वो दिन याद आते हैं, जब हम टॉफ़ी के लिए जी-जान लगा देते थे|| मुझे आज भी वो दिन याद आते हैं, जब हम काँच की शीशी टूट जाने पर उसे बिस्तर के नीचे सरका देते थे|| मुझे आज भी वो दिन याद आते हैं, जब कम नम्बर आने पर माँ-पापा के सामने आँसू पहले आंसर शीट बाद में पेश किये जाते थे|| मुझे आज भी वो दिन याद आते हैं, जब हम घंटों बैठ कर फ़िज़िक्स के उस एक प्रश्न में अटके रहते थे|| मुझे आज भी वो दिन याद आते हैं, और जब याद आते हैं, ज़ुबान पर बस पाँच शब्द आते हैं-वो भी क्या दिन थे|| परन्तु आज भी कुछ ख़ास बदला नहीं है|| तब भी हम ग़ल्तियाँ करते थे, आज भी करते हैं| फ़र्क सिर्फ़ इतना है, तब हम सुधार लेते थे आज मौका नहीं मिलता|| तब टॉफ़ी के लिए मेहनत करते थे, आज रोटी के लिए करते हैं| फ़र्क सिर्फ़ इतना है, तब लगन होती थी आज ज़रूरत है|| तब भी कम नम्बर आते थे, आज भी कम ही आते हैं| फ़र्क सिर्फ़ इतना है, तब हम टूट कर और मज़बूती से जुड़ जाते थे आज टूट कर बिखर जाते हैं|| तब भी हम घंटों बैठ कर प्रश्न में उलझे रहते थे, आज भी ऑफ़िस में बैठ कर बग्स के साथ उलझे रहते हैं| फ़र्क सिर्फ़ इतना है, तब जिज्ञासा थी, आज मज़बूरी है|| तब...